परिभाषाएँ- 

इस संहिता में :-
(1)’’आबादी’’ या ’’ग्रामीण आबादी’’ का तात्पर्य किसी ग्राम के ऐसे क्षेत्र से है जिसका उपयोग इस संहिता के प्रारम्भ होने के दिनांक को उसके निवासियों के आवास के प्रयोजनों के लिए या उसके सहायक प्रयोजनों
यथा, सहन व हरे वृक्षों, कुआँ आदि के लिए किया जा रहा हो या जिसे एतद्पश्चात ऐसे प्रयोजन के लिए आरक्षित किया गया हो या किया जाए ;

(2)  ’’कृषि’’  के  अन्तर्गत  बागवानी, पशुपालन, मत्स्य  पालन, फूलों की  खेती, मधुमक्खी  पालन और  कुक्कुट

पालन भी है ;


(3) ’’कृषि श्रमिक’’ का तात्पर्य ऐसे व्यक्ति से है जिसकी जीविका का मुख्य  स्त्रोत कृषि भूमि पर शारीरिक श्रम है ;


(4) ’’बैंक’’ का तात्पर्य वही होगा जो उत्तर प्रदेश साहूकारी विनियमन अधिनियम, 1976 में उसके लिये दिया गया है ;


(5)  ’’भूमि  प्रबन्धक  समिति’’  का  तात्पर्य  उत्तर  प्रदेश  पंचायत  राज  अधिनियम,  1947  की  धारा  28-क  के अधीन गठित किसी भूमि प्रबन्धक समिति से है ;


(6) ’’परिषद’’ का तात्पर्य धारा 7 के अधीन गठित या गठित समझे जाने वाले राजस्व परिषद से है ;


(7) ’’पूर्त संस्था’’ का तात्पर्य किसी पूर्त प्रयोजन के लिये गठित किसी अधिष्ठान, उपक्रम, संगठन या संघ से है और उसके अन्तर्गत कोई विनिर्दिष्ट विन्यास भी है ;


(8) ’’कलेक्टर’’ का तात्पर्य धारा 12 की उपधारा (1) के अधीन राज्य सरकार द्वारा इस रूप में नियुक्त किसी अधिकारी से है और उसके अन्तर्गत निम्नलिखित भी होंगे,-


(क) उक्त धारा की उपधारा (2) के अधीन राज्य सरकार द्वारा नियुक्त कोई अपर कलेक्टर ; और


(ख) इस संहिता के अधीन कलेक्टर  के सभी या किन्हीं कृत्यों का निष्पादन करने के लिये राज्य सरकार द्वारा अधिसूचना द्वारा, सशक्त प्रथम श्रेणी का असिस्टेन्ट कलेक्टर ;


(9) ’’संचित गांव निधि’’ का तात्पर्य धारा 69 के अधीन गठित संचित गांव निधि से है ;


(10)  किसी  भू-खातेदार  के  सम्बन्ध  में  ’’परिवार’’  का  तात्पर्य  यथास्थिति  स्वयं  पुरूष  या  स्त्री  और  उसकी पत्नी या उसका पति (न्यायिक रूप से पृथक पत्नी या पति से भिन्न) अवयस्क पुत्रों, और विवाहित पुत्रियों से भिन्न अवयस्क पुत्रियों से है :


परन्तु  जहाँ  प्रश्न  किसी  भूमि  के  अन्तरण  से  सम्बन्धित  हो  और  अन्तरिती  अवयस्क  हो  वहाँ  पद
’’परिवार’’ के अन्तर्गत ऐसे अवयस्क के माता-पिता होंगे;


(11) ’’बाग-भूमि’’ का तात्पर्य किसी जोत में भूमि के किसी विनिर्दिष्ट भाग से है जिसमें इस प्रकार वृक्ष लगे हों (जिसमें पपीता या केला के पौधे सम्मिलित नहीं हैं) कि वे किसी भूमि को या उसके किसी समुचित भाग को  किसी  अन्य  प्रयोजन  के  लिये  उपयोग में लाए  जाने  से  रोकते  हों,  या  पूर्ण  रूप  से  विकसित  होने  पर रोकेंगे और ऐसी भूमि पर लगे वृक्ष एक बाग का रूप धारण करेंगे ;


(12)  ’’जोत’’  का  तात्पर्य  एक  भू-खातेदारी,  एक  पट्टे,  वचनबद्ध  या  अनुदान  के  अधीन  रखे  गये  भूमि  के किसी खण्ड से है ;
(13) किसी जोत के सम्बन्ध में ’’सुधार’’ का तात्पर्य ऐसे किसी संकर्म से है जिससे जोत के मूल्य में भौतिक


रूप से अभिवृद्धि होती हो और जो उसके लिए उपयुक्त हो और उस प्रयोजन के सुसंगत हो जिस हेतु उसे रखा गया हो और जो यदि जोत पर निष्पादित न किया जाए, उसके लाभ के लिए या तो प्रत्यक्ष रूप से
 

सम्पादित किया जाता हो या सम्पादन के पश्चात उसके लिए प्रत्यक्ष रूप से लाभप्रद बनाया जाता हो और पूर्ववर्ती उपबन्धों के अधीन उसके अन्तर्गत निम्नलिखित संकर्म भी हैं-
 

(एक)  कृषि  प्रयोजनों  के  लिये  जल  के  भण्डारण,  आपूर्ति  या  वितरण  के  लिए  तालाबों,  कुओं, जल-प्रणालियों, तटबन्धों का निर्माण और अन्य कार्य ;
 

(दो) भूमि के जल-निकास हेतु या बाढ़ से या जल से भूमि के कटाव या अन्य क्षति से भूमि की रक्षा हेतु निर्माण कार्य ;
 

(तीन)  वृक्षारोपण  करना,  भूमि  को  कृषि  योग्य  बनाना,  घेराबन्दी  करना,  समतल  अथवा  सीढ़ीदार बनाना ;
 

(चार) आबादी या नगरीय क्षेत्र को छोड़कर अन्यत्र जोत के आस-पास जोत के सुविधाजनक या लाभप्रद उपयोग या अध्यासन के लिए आवश्यक भवनों का निर्माण ; और
 

(पाँच) पूर्वोक्त संकर्मो में से किसी संकर्म का नवीकरण या पुनर्निर्माण या उसमें परिवर्तन या उसका परिवर्धन ;
 

(14) ’’भूमि’’ का तात्पर्य, अध्याय सात और आठ और धारा 80, 81 और धारा 136 के सिवाय, ऐसी भूमि से है जो कृषि से सम्बद्ध प्रयोजनों के लिये धृत या अध्यासित हो ;
 

(15) ’’भूमि धारक’’  का तात्पर्य, ऐसे व्यक्ति से है जिसे  लगान देय हो या  देय होती  यदि  कोई स्पष्ट या विवक्षित संविदा न होती ;
 

(16) ’’राजस्व न्यायालय’’ का तात्पर्य, निम्नलिखित प्राधिकारियों में से सभी या किसी प्राधिकारी, (नामस्वरूप) परिषद और उसके सभी सदस्य, आयुक्त, अपर आयुक्त, कलेक्टर, अपर  कलेक्टर, मुख्य  राजस्व  अधिकारी, असिस्टेन्ट कलेक्टर, बन्दोबस्त अधिकारी, सहायक बन्दोबस्त अधिकारी, अभिलेख अधिकारी, सहायक अभिलेख
अधिकारी, तहसीलदार, तहसीलदार (न्यायिक) और नायब तहसीलदार से है ;


(17)  ’’राजस्व  अधिकारी’’  का  तात्पर्य  आयुक्त,  अपर  आयुक्त,  कलेक्टर,  अपर  कलेक्टर,  मुख्य  राजस्व
अधिकारी,  उप  ज़िलाधिकारी,  सहायक  कलेक्टर,  बन्दोबस्त  अधिकारी,  सहायक  बन्दोबस्त  अधिकारी,  अभिलेख अधिकारी,  सहायक  अभिलेख  अधिकारी,  तहसीलदार,  तहसीलदार  (न्यायिक),  नायब  तहसीलदार  और  राजस्व निरीक्षक से है ;


(18) ’’उप ज़िलाधिकारी’’ का तात्पर्य, तहसील के प्रभारी असिस्टेन्ट कलेक्टर से है ;


(19)  ’’टौंगिया  रोपवनी’’  का  तात्पर्य,  ऐसी  वनरोपण  प्रणाली  से  है  जिसके  पहले  चरण  में  वृक्षारोपण  कृषि फसल के उगाने के साथ-साथ किया जाता है जिसमें फसल का विकास इस प्रकार रोपित वृक्षों द्वारा फैलाव बनाने पर रूक जाता है जिससे कृषि फसल की खेती असंभव हो जाती है ;


(20)  ’’गांव’’  का  तात्पर्य,  किसी  ऐसे  स्थानीय  क्षेत्र  से  है,  जो  चाहे  घना  हो  या  नहीं,  तत्सम्बन्धी  ज़िले  के राजस्व अभिलेख में गांव के रूप में अभिलिखित हो और उसके अन्तर्गत ऐसा क्षेत्र भी है जिसे राज्य सरकार सामान्य या विशेष अधिसूचना द्वारा गांव के रूप में घोषित करे ;
 

(21)  ’’गांव  शिल्पी’’  का  तात्पर्य,  ऐसे  व्यक्ति  से  है  जिसकी  जीविका  का  मुख्य  स्त्रोत  कृषि  या  उसके आनुषंगिक प्रयोजनों के लिये प्रयोग में लाए जाने वाले परम्परागत औजारों-उपकरणों और अन्य सामानों या वस्तुओं का निर्माण या मरम्मत है और उसके अन्तर्गत बढ़ई, बुनकर, कुम्हार, लोहार, रजतकार, सुनार, नाई,
धोबी, मोची या ऐसा कोई अन्य व्यक्ति भी है जो सामान्यतः किसी गांव में अपने परिश्रम से या अपने परिवार के किसी सदस्य के परिश्रम से शिल्पकारी करके अपनी जीविका का अर्जन करता है ;


(22)  शब्द  और  पद  ’’गांव  निधि’’,  ’’ग्राम  सभा’’  और  ‘‘ग्राम  पंचायत’’  के  वही  अर्थ  होंगे  जो  उत्तर  प्रदेश पंचायत राज अधिनियम, 1947 में उनके लिए दिए गये हैं;
(23) ‘कृषि वर्ष’  का तात्पर्य  ऐसे वर्ष से  है जो   कैलेण्डर वर्ष  में  जुलाई के  प्रथम  दिन से आरम्भ  होकर जून के तीसवें दिन पर समाप्त होता है। इसे ‘फसली वर्ष’ भी कहा जाता है;


(24) ‘मध्यवर्ती’ का  तात्पर्य, जब  उसका सम्बन्ध  किसी  आस्थान  से हो,  उक्त  आस्थान  या  उसके  किसी भाग के  स्वामी,  मातहतदार,  अदना  मालिक,  ठेकेदार,  अवध  के  पट्टेदार  दवामी  या  इस्तमरारी  और  दवामी काश्तकार से है;


(25) ‘पट्टा’ के अन्तर्गत, जब उसका सम्बन्ध खानों या खनिज पदार्थों से हो, शिकमी पट्टा, अन्वेषण पट्टा और पट्टा देने या शिकमी उठाने के अनुबन्ध भी हैं और ‘पट्टेदार’ की भी व्याख्या तद्नुसार ही की जाएगी;


(26)  ‘डिक्री’  का  वही  अर्थ  होगा,  जो  सिविल  प्रकिया  संहिता,  1908  (अधिनियम  संख्या  5,  सन्  1908)  की
धारा 2 में इसके लिए समनुदेशित है;


(27) ‘राज्य सरकार’ का तात्पर्य उत्तर प्रदेश की राज्य सरकार से है;


(28)  ‘केन्द्रीय  सरकार’  का  अर्थ  होगा,  जो  साधारण  खण्ड  अधिनियम,  1897  (अधिनियम  संख्या  10,  सन् 1897) की धारा 3 में इसके लिए समनुदेशित है;


(29) ‘मिनजुमला संख्या’ का तात्पर्य  सैद्धान्तिक रूप से विभाजित लेकिन भौतिक रूप से अविभाजित खेत के जुज भाग को इंगित करने वाली ‘शजरा संख्या’ से है।