आवंटी को कब्जा प्रदान किया जाना-
(1) जहां धारा 64 के अधीन किसी भवन के निर्माण के लिए
धारा 63 में निर्दिष्ट किसी भूमि का आवंटन किया गया हो और इस संहिता के उपबन्धों के उल्लंघन में किसी आवंटी से भिन्न किसी व्यक्ति के अधिभोग में ऐसी भूमि हो वहां उप ज़िलाधिकारी स्वप्रेरणा से आवंटी को ऐसी भूमि का कब्जा दिला सकता है और आवंटी के आवेदन करने पर ऐसी भूमि का कब्जा आवंटी को दिलायेगा और उक्त प्रयोजन के लिये ऐेसे बल का प्रयोग कर सकता है या करा सकता है जैसा कि वह उचित समझे।
(2) जहां कोई व्यक्ति इस धारा के अधीन बेदखल कराये जाने के पश्चात् भूमि व उसके किसी भाग को किसी विधि पूर्ण प्राधिकार के बिना पुनः अधिभोग में लेता है तो वहां वह ऐसी अवधि के कारावास से दण्डित किया जाएगा जो दो वर्ष तक हो सकती है किन्तु तीन माह से कम नहीं होगा और ऐेसे जुर्माने के साथ भी दण्डित किया जाएगा जो तीन हजार रूपये तक हो सकता है :
परन्तु न्यायालय दण्ड पारित करते समय अभियुक्त को दोषसिद्ध करते हुए यह निदेश दे सकता है कि ऐसे जुर्माने जिसे वसूल किया जाय का सम्पूर्ण या ऐसा भाग आवंटी को उपयोग और अधिभोग के लिये
क्षति स्वरूप दिया जाए जैसा कि न्यायालय उचित समझे।
(3) जहां उपधारा (2) के अधीन किसी कार्यवाही में मामले को संज्ञान लिए जाने के पश्चात् न्यायालय का किसी भी स्तर पर शपथ-पत्र द्वारा या अन्यथा द्वारा समाधान कर दिया जाता है कि :-
(क) इस संहिता के उपबन्धों के उल्लंघन में अभियुक्त का ऐसी भूमि पर अधिभोग है जिससे ऐसी कार्यवाही सम्बन्धित हो, और
(ख) आवंटी ऐसी भूमि पर कब्जे के लिये हकदार हो, तो न्यायालय संक्षिप्ततः मामले के अन्तिम अवधारण को लम्बित रखते हुए ऐसी भूमि को अभियुक्त से खाली करा सकता है और आवंटी को
ऐसी भूमि पर कब्जा दिला सकता है।
(4) जहां उपधारा (2) के अधीन किसी कार्यवाही में किसी अभियुक्त को दोषी ठहराया जाता है वहां उपधारा
(2) के अधीन पारित अन्तरिम आदेश की पुष्टि न्यायालय द्वारा की जाएगी।
(5) जहां उपधारा (2) के अधीन किसी कार्यवाही में अभियुक्त को दोषमुक्त किया जाता है या मुक्त किया जाता है और न्यायालय का यह समाधान हो जाता है कि इस प्रकार दोषमुक्त या मुक्त व्यक्ति ऐसी भूमि पर कब्जा प्राप्त करने के लिये हकदार है वहां न्यायालय ऐसे व्यक्ति के आवेदन करने पर यह निदेश देगा कि उसे कब्जा प्रदान किया जाय।
(6) दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी उपधारा (2) के अधीन किसी अपराध पर संक्षिप्ततः विचारण किया जा सकता है।
(7) इस धारा के अधीन अपराधों के त्वरित विचारण के प्रयोजन से राज्य सरकार उǔच न्यायालय के परामर्श से अधिसूचना द्वारा विशेष न्यायालयों का गठन कर सकती है, जिसमें प्रत्येक न्यायालय में एक ऐसा अधिकारी होगा जो ऐसे उप ज़िला मजिस्ट्रेट की श्रेणी से नीचे का न हो जो दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 के
उपबंधों के अधीन ऐसे अपराध के सम्बन्ध में प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट की शक्तियों का प्रयोग करेगा।
(8) दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (अधिनियम संख्या 2 सन् 1974) में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी उपधारा (2) के अधीन दण्डनीय प्रत्येक अपराध संज्ञेय और गैर जमानती होगा।