असंक्रमणीय अधिकार वाला भूमिधर-
(1) निम्नलिखित वर्गों में से किसी वर्ग का प्रत्येक व्यक्ति असंक्रमणीय अधिकार वाला भूमिधर कहा जायेगा और उसको वे सब अधिकार प्राप्त होंगे और वह उन सब दायित्वों के अधीन होगा जो इस संहिता के द्वारा या अधीन ऐसे भूमिधरों को प्रदत्त किए गए हों या उन पर आरोपित किए गए हों, अर्थात-
(क) प्रत्येक व्यक्ति जो इस संहिता के प्रारम्भ के दिनांक के ठीक पूर्व असंक्रमणीय अधिकार वाला भूमिधर था;
(ख) प्रत्येक व्यक्ति जिसे भूमि प्रबन्धक समिति द्वारा उक्त दिनांक को या उसके पश्चात् इस संहिता के उपबन्धों के अधीन या अनुसार किसी भूमि पर असंक्रमणीय अधिकार वाले भूमिधर के रूप में स्वीकार किया गया हो;
(ग) प्रत्येक व्यक्ति जिसे उक्त दिनांक को या उसके पश्चात उत्तर प्रदेश भूदान यज्ञ अधिनियम, 1952 के उपबन्धों के अधीन कोई भूमि आवंटित हो;
(घ) प्रत्येक व्यक्ति जिसे उस दिनांक को या उसके पश्चात उत्तर प्रदेश अधिकतम जोत सीमा आरोपण अधिनियम, 1960 के उपबन्धों के अधीन कोई भूमि आवंटित हो;
(घघ) प्रत्येक व्यक्ति जो इस संहिता के लागू होने के दिनांक से ठीक पहले, धारा 77 के अन्तर्गत न आने वाली भूमि का कब्जेदार असामी था और 1407 फसली के वार्षिक रजिस्टर (खतौनी) की श्रेणी-3 में इस रूप में दर्ज था :
परन्तु यह कि जहां किसी व्यक्ति की कब्जे की भूमि और उसके द्वारा उत्तर प्रदेश में धृत कोई अन्य भूमि, जो उत्तर प्रदेश अधिकतम जोत सीमा आरोपण अधिनियम, 1960 के अधीन अवधारित अधिकतम क्षेत्र से अधिक हो, वहां ऐसे व्यक्ति के पक्ष में प्रथम उल्लिखित भूमि के उतने क्षेत्र के सम्बन्ध में जो उसके द्वारा धृत ऐसी अन्य भूमि को मिलाकर उस पर लागू अधिकतम क्षेत्र से अधिक न हो, असंक्रमणीय अधिकार वाला भूमिधरी अधिकार प्रोद्भूत होगा और उक्त क्षेत्र उपर्युक्त अधिनियम में निर्धारित सिद्धान्तों के अनुसार विहित रीति से सीमांकित किया जायेगा;
(ङ) प्रत्येक व्यक्ति जो इस संहिता के उपबन्धों के अधीन या अनुसार या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन किसी अन्य रीति से उक्त दिनांक को या उसके पश्चात् ऐसे भूमिधर का अधिकार प्राप्त कर लें।
(2) प्रत्येक व्यक्ति जो इस संहिता के प्रारम्भ के ठीक पूर्व असंक्रमणीय अधिकार वाला भूमिधर हो और पाँच वर्ष या अधिक अवधि के लिए ऐसा भूमिधर रहा हो, ऐसे प्रारम्भ पर संक्रमणीय अधिकार वाला भूमिधर हो जाएगा।
(3) प्रत्येक व्यक्ति जो उपधारा (1) और (2) में निर्दिष्ट प्रारम्भ पर असंक्रमणीय अधिकार वाला भूमिधर हो या
ऐसे प्रारम्भ के पश्चात असंक्रमणीय अधिकार वाला भूमिधर हो जाता है, असंक्रमणीय अधिकार वाला भूमिधर होने से पाँच वर्ष की अवधि की समाप्ति पर संक्रमणीय अधिकार वाला भूमिधर हो जाएगा।
(4) इस संहिता के किसी अन्य उपबन्ध में दी गयी किसी बात के होते हुए भी, यदि कोई व्यक्ति उपधारा (2)
या उपधारा (3) के अधीन संक्रमणीय अधिकार वाला भूमिधर हो जाने के पश्चात् बिक्री द्वारा भूमि का अन्तरण करता है तो वह ग्राम पंचायत या राज्य सरकार में निहित किसी भूमि के या उत्तर प्रदेश अधिकतम जोत
सीमा आरोपण अधिनियम, 1960 में यथापरिभाषित अतिरिक्त भूमि के पट्टे के लिये पात्र नहीं रह जाएगा।