भूमिधर  द्वारा  अन्तरण  पर  प्रतिबन्ध- 

(1)  किसी  भूमिधर  को,  किसी  जोत  या  उसके  भाग  का  ऐसा अन्तरण का अधिकार न होगा जहां ऐसा अन्तरण उपधारा (2) या उपधारा (3) के उपबन्धों का उल्लंघन हो या उल्लंघन होने की संभावना हो।
(2) उपधारा (3) के उपबन्धों के अधीन रहते हुए किसी व्यक्ति को किसी संक्रमणीय अधिकार वाले भूमिधर से
क्रय  या  दान  के  द्वारा  किसी  जोत  या  उसके  भाग  को  अर्जित  करने  का  अधिकार  न  होगा,  जहां  ऐसे  अर्जन के  परिणाम  स्वरूप  अंतरिती  भूमि  का  हकदार  बन  जाता  है  जो  कि  ऐसे  अंतरिती  द्वारा  धृत  भूमि,  यदि  कोई हो,  को  मिलाकर  और  जहां  पर  ऐसा  अंतरिती  प्रकृत व्यक्ति  है,  उसके परिवार  द्वारा  धृत भूमि,  यदि  कोई  हो,
को भी मिलाकर उत्तर प्रदेश में 5.0586 हेक्टेयर से अधिक हो जाती है।
(3) राज्य सरकार सामान्य या विशेष आदेश द्वारा उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट सीमाओं से अधिक किसी अर्जन को प्राधिकृत कर सकती है, यदि ऐसा अर्जन पूर्त या औद्योगिक प्रयोजनों के लिये हों और किसी पंजीकृत सोसाइटी या किसी कम्पनी या अन्य  निगम  या  शिक्षण  संस्था  या किसी पूर्त संस्था के पक्ष में हों और यदि उसकी राय हो कि ऐसा अर्जन लोकहित में होगा,  और ऐसे किसी मामले में उत्तर प्रदेश अधिकतम जोत
सीमा आरोपण अधिनियम, 1960 के उपबन्ध ऐसे अर्जन पर लागू नहीं होंगे।

परंतु यह की जहां भूमि किसी रजिस्ट्रीकरण रजिस्ट्रीकरण ,फर्म कंपनी पार्टनरशिप फर्म  लिमिटेड लायबिलिटी पार्टनरशिप फर्म न्यास समिति अथवा किसी अन्य शैक्षिक या पूर्त  संस्था द्वारा इस उप धारा या निरीक्षण निरसन के पूर्व यथा अधिनियमित उत्तर प्रदेश प्रदेश जमीदारी विनाश एवं भूमि व्यवस्था अधिनियम 1950 की धारा 154 की उप धारा [ 3 ] के आधीन और उन्मूलन प्राप्त किए बिना अर्जित अथवाक क्रय  की गई हो वहां राज्य सरकार अथवा इस अधिनियम के आधीन इस प्रयोजन हेतु राधा राधा प्राधिकृत कोई अधिकारी जुर्माना स्वरूप ऐसी किसी धनराशि को जो आवेदन करते समय प्रचलित सर्किल दर के अनुसार आ गणित उप धारा दो के आधीन वीर ही ही ही ही विहित सीमा से अधिक भूमि की लागत की 10 प्रतिशत होगी का भुगतान करने के पश्चात ऐसे अर्जन अथवा  करें हो विनिर्मित विनियमित करने के लिए अपना अनुमोदन प्रदान कर सकती सकता है