फसलों और पेड़़ों पर अधिकार-
(1) जहाँ धारा 131 के अधीन किसी वाद में पारित डिक्री के निष्पादन में कोई असामी बेदखल किया जाता है और न्यायालय का यह समाधान हो जाता है कि न्यायनिर्णीत ऋणी की असंगृहीत कोई फसल या पेड़़ भूमि पर विद्यमान है, तो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 में दी गयी किसी बात के होते हुए भी न्यायालय निम्नलिखित रीति से कार्यवाही करेगा :-
(क) यदि न्यायनिर्णीत ऋणी पर देय धनराशि ऐसी फसलों या पेड़़ों के मूल्य के बराबर या अधिक है तो न्यायालय ऐसी फसलों और पेड़ों के साथ भूमि का कब्जा डिक्री धारक को परिदत्त करेगा और ऐसी फसलों और पेड़ों में न्यायनिर्णीत ऋणी के सभी अधिकार डिक्री धारक को चले जाएंगे;
(ख) यदि न्यायनिर्णीत ऋणी का देय धनराशि ऐसी फसलों और पेड़ों के मूल्य से कम है, और-
(एक) डिक्री धारक ऐसी धनराशि और मूल्य के बीच के अन्तर का भुगतान न्यायनिर्णीत ऋणी को कर देता है तो न्यायालय भूमि का कब्जा डिक्री धारक को सौंप देगा और ऐसी फसलों या पेड़ों में
या पर न्यायनिर्णीत ऋणी के सभी अधिकार डिक्री धारक को चले जायेंगे;
(दो) डिक्री धारक ऐेसे अन्तर का भुगतान नहीं करता है तो न्यायनिर्णीत ऋणी को भूमि के उपयोग और अध्यासन हेतु न्यायालय द्वारा यथा नियत प्रतिकर का भुगतान करने पर ऐसी फसलों, पेड़ों या
ऐसे पेड़ों के फलों की देखभाल करने, एकत्रित करने या हटाने का अधिकार होगा जब तक कि
ऐसी फसल या पेड़ यथास्थिति, एकत्रित किये या हटाये या काटे नहीं जाते या वे मृत नहीं हो जाते।
(2) डिक्री निष्पादनकर्ता न्यायालय, किसी पक्षकार के आवेदन पर फसलों या पेड़ों के मूल्य का और उपधारा
(1) के उपबन्धों के अधीन न्यायनिर्णीत ऋणी द्वारा देय प्रतिकर का अवधारण कर सकता है।